➤ बार-बार तारीखें मांगना न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर बीमारी, हाईकोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी
➤ चेक बाउंस मामले में आरोपी शेर सिंह की याचिका खारिज, निचली अदालत का आदेश बरकरार
➤ लकवे के दौरे की दलील पर पेश की गईं 2023 और 2025 की पर्चियां, नहीं मिली राहत
शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों में बार-बार स्थगन मांगने की प्रवृत्ति पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने टिप्पणी की कि मुकदमों में बेवजह तारीखें मांगना न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर बीमारी बन चुका है। अदालत के अनुसार बार-बार मिलने वाली तारीखें न्याय प्रणाली को कैंसर की तरह खोखला कर रही हैं। इससे न केवल पीड़ितों का न्याय व्यवस्था से भरोसा उठता है, बल्कि न्याय मिलने में भी अनावश्यक देरी होती है।
न्यायाधीश राकेश कैंथला की अदालत ने कहा कि निष्पक्ष सुनवाई का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी बार-बार तारीखें लेकर मुकदमे को अनिश्चितकाल तक खींचता रहे। अदालतों को गलत सहानुभूति दिखाकर लगातार स्थगन देने से बचना चाहिए। अदालत ने भारतीय न्याय व्यवस्था में करोड़ों मामलों के लंबित रहने के पीछे धीमी सुनवाई की प्रवृत्ति को भी प्रमुख कारण बताया। अदालत ने यह टिप्पणी आरोपी शेर सिंह की याचिका खारिज करते हुए की। हाईकोर्ट ने कुल्लू की निचली अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें आरोपी का बचाव पक्ष का साक्ष्य पेश करने का अधिकार बंद कर दिया गया था।
चेक बाउंस से जुड़ा है मामला
यह मामला शिकायतकर्ता कंवर शिव पाल सिंह की ओर से आरोपी के खिलाफ 4.90 लाख रुपये के चेक बाउंस से जुड़ा है। आरोपी के खिलाफ मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कुल्लू की अदालत में मामला विचाराधीन था। मुकदमे के दौरान आरोपी को बेगुनाही साबित करने के लिए गवाह और दस्तावेज पेश करने के कई अवसर दिए गए, लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाया। 11 सितंबर 2026 को निचली अदालत ने उसका बचाव पक्ष का साक्ष्य बंद कर दिया।
इस आदेश को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उसने दलील दी कि वह गंभीर रूप से बीमार था और उसे लकवे का दौरा पड़ा था, जिसके कारण वह अदालत के समक्ष सबूत पेश नहीं कर सका। हालांकि, हाईकोर्ट ने मेडिकल दस्तावेज की जांच में पाया कि आरोपी की ओर से पेश फिजियोथेरेपिस्ट की पर्चियां वर्ष 2023 और 2025 की थीं। उसके पास 11 सितंबर को कोर्ट में सबूत पेश न करने के लिए कोई ताजा और वैध मेडिकल दस्तावेज उपलब्ध नहीं था।
आम लोगों के लिए जरूरी बातें
चेक बाउंस होना परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत अपराध माना जाता है। चेक अनादरित होने पर लेनदार को बैंक की रिटर्न मेमो मिलने के 30 दिन के भीतर लिखित नोटिस भेजना होता है, और नोटिस मिलने के 15 दिन में भुगतान न होने पर शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। चेक जारी करने से पहले खाते में पर्याप्त राशि सुनिश्चित करें और लेन-देन के लिखित प्रमाण, रसीद तथा बैंक मेमो संभालकर रखें। अदालत में बीमारी के आधार पर तारीख या राहत मांगते समय ताजा, वैध और संबंधित तारीख का मेडिकल प्रमाणपत्र ही पेश करें, क्योंकि पुराने या असंबद्ध दस्तावेज स्वीकार नहीं किए जाते। मुकदमे में गवाह और साक्ष्य समय पर पेश करना जरूरी है, वरना बचाव का अधिकार बंद हो सकता है। कानूनी मामलों में किसी योग्य अधिवक्ता से सलाह जरूर लें।



